आखिर बुढ़ापे मैं ही जीवनसाथी की अहमियत क्यूँ समझ आती है |
रामदास अकेला बैठा बहुत गहरी सोच मे डूबा हुआ था | उसकी शादी को 40 साल हो चुके थे आज वो बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था | रामदास ने अपनी पत्नी सुमित्रा को कभी कोई मान सम्मान नहीं दिया न ही कभी उसकी खुशियों के बारे में सोचा | बस अपने घरवालों को ही प्राथमिकता देता था | माँ , बहन – भाई को ही सब कुछ मानता था |
सुमित्रा के साथ हमेशा मार पीट , गालियाँ देना बस यही सब | रामदास ने कभी नहीं सोचा कि अपने जीवनसाथी को अपनी लाइफ में क्या दर्जा देना चाहिए | सुमित्रा चुप चाप ये सब सहती रही क्यूंकि उसने अपने बच्चों के बारे में सोचा, और वह अपनी फूटी किस्मत समझ कर अपनी ज़िंदगी काटने लगी |
अब शादी को 40 साल हो चुके थे | रामदास की माँ मर चुकी थी बहनो की शादी हो चुकी थी भाई अलग हो चुके थे बेटी की शादी हो चुकी थी बेटे-बहुएँ जॉब में बिजी थे | अब रामदास के पास सुमित्रा के आलावा कोई सहारा ना था |
अब रामदास की हालत ऐसी थी कि वो अब अकेला नहीं रह सकता था और अकेला होता तो उसका मन घबरा जाता इसलिए सुमित्रा हमेशा रामदास के पास रहती थी कभी अकेला नहीं छोड़ती उसने अपना पत्नीधर्म अच्छे से निभाया | बुढ़ापे में हर इंसान को यही चाहिए कि कोई उनकी बात सुने उनके साथ बैठे |
बच्चे कितने भी अच्छे हो पर हर पल साथ नहीं हो सकते क्योकि उन्हें भी अपने बच्चों का भविष्य देखना अपने माँ – बाप की , बच्चों की जरूरते पूरी करनी होती है इसलिए ना बच्चे हमेशा साथ रहते है ना ही माँ-बाप जिंदगी भर साथ रहते हैं | ज़िंदगी भर का साथ तो बस जीवनसाथी ही दे सकता है |
अब 40 साल बाद रामदास को यह बात समझ आयी | अच्छा होता उसे यह बात पहले समझ आ जाती तो सुमित्रा को इतना सब ना सहना पड़ता | रामदास ने अपनी पत्नी से माफी मांगी और अपनी गलतियों का पश्चाताप किया , सुमित्रा कुछ पल के लिए कहीं खो गयी उसने सोचा अब बुढ़ापे में जाकर मुझे अपने जीवनसाथी का साथ मिला है पूरी ज़िंदगी तो गालियाँ खाकर निकल गई |
लेकिन फिर भी सुमित्रा ने रामदास को माफ़ कर दिया और दोनों ने प्रण किया कि बची हुई ज़िंदगी को प्यार से बिताएंगे | ज़िंदगी मैं हर रिश्ते की अलग अहमियत होती है|
सभी शादी- शुदा लड़के और लड़कियों को टाइम रहते अपने जीवनसाथी की अहमियत को समझना चाहिए, इससे ज़िंदगी बहुत प्यारी और आसान लगने लगती है |


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